Homeदेश विदेशरूस और यूक्रेन युद्ध से बहुत पहले का इतिहास

रूस और यूक्रेन युद्ध से बहुत पहले का इतिहास

रूस और यूक्रेन के युद्ध में विकसित देशों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। विकसित देश क्यों और कैसे विकसित हुए ? युद्धों के भयानक इतिहास के बावजूद रूस यूक्रेन युद्ध को आखिर क्यों हवा दी गई होगी ? जवाब दिलचस्प होने जा रहे हैं क्योंकि जवाब ही सबसे बड़े सवाल हैं । रूस और यूक्रेन के विस्तृत अध्ययन हमारे पाठकों तक पहुंचाने में हमें खुशी हो रही है और साथ ही एक दुःख भी है कि मानवजाति इतनी सभ्य, शिक्षित और विकसित होने के बावजूद इस तरह की गतिविधियों में लिप्त है । इस विस्तृत अध्ययन की पहली किश्त में हम आपको रूस और यूक्रेन का इतिहास बता रहे हैं ।

यूकेश चंद्राकर

रूस और यूक्रेन के इतिहास का प्रारंभ

रूस और यूक्रेन के संबंधों का इतिहास गहराई से जुड़ा हुआ है, जो सदियों पुराना है। दोनों देशों का एक साझा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आधार है, जिसे किवन रस (Kievan Rus) के रूप में जाना जाता है। किवन रस एक पूर्वी स्लाविक राज्य था जो 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच आधुनिक रूस, यूक्रेन और बेलारूस के क्षेत्रों में फैला हुआ था। यह रूस और यूक्रेन दोनों के लिए सांस्कृतिक, राजनीतिक और धार्मिक विकास का स्रोत था। किवन रस की राजधानी कीव थी, जो आज यूक्रेन की राजधानी है। इस साम्राज्य ने पूर्वी यूरोप में रूढ़िवादी ईसाई धर्म को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और रूसी और यूक्रेनी दोनों लोगों के लिए सांस्कृतिक जड़ों का प्रतीक बना रहा।

किवन रस की स्थापना 9वीं शताब्दी में की गई थी और यह मध्यकालीन यूरोप के सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक था। यहां के लोगों ने एक हिंसक और लुटेरे समुदाय जिसकी डिक्शनरी में पाप जैसा कोई शब्द नहीं था; वाइकिंग्स, और बीजान्टिन साम्राज्य से कई सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध स्थापित किए। 988 ईस्वी में, व्लादिमीर द ग्रेट ने ईसाई धर्म को किवन रस का आधिकारिक धर्म घोषित किया, जिसने रूस और यूक्रेन की सांस्कृतिक और धार्मिक दिशा को स्थायी रूप से बदल दिया। व्लादिमीर ने बीजान्टिन साम्राज्य से रूढ़िवादी ईसाई धर्म अपनाया और इसे अपने पूरे राज्य में फैलाया। यही वह बिंदु था जहां से रूस और यूक्रेन की धार्मिक और सांस्कृतिक धारा एक साथ बहने लगी।

13वीं शताब्दी में मंगोल आक्रमण के बाद किवन रस का पतन हो गया, और यह क्षेत्र कई छोटे-छोटे रियासतों में बंट गया। इन रियासतों पर समय-समय पर मंगोलों, लिथुआनियाई और पोलिश साम्राज्यों का प्रभुत्व रहा। किवन रस के पतन के बाद, मॉस्को की रियासत ने धीरे-धीरे ताकत हासिल की और 15वीं शताब्दी तक एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर आई। मॉस्को ने खुद को किवन रस की विरासत का उत्तराधिकारी घोषित किया और इस तरह “रूस” का नाम प्रचलित हुआ। हालांकि, यूक्रेन ने अपना अलग विकास किया और पश्चिमी यूरोप, विशेष रूप से पोलैंड और लिथुआनिया, से प्रभावित हुआ।

रूसी साम्राज्य और यूक्रेन

18वीं शताब्दी में, रूस ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया और यूक्रेन के अधिकांश हिस्सों पर नियंत्रण स्थापित किया। 1654 में पेरियास्लाव समझौते के तहत यूक्रेन का बड़ा हिस्सा रूसी साम्राज्य के अधीन आ गया। यह समझौता रूसी और यूक्रेनी इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। हालांकि, इस समझौते को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग व्याख्याएं हैं। यूक्रेनी इसे एक राजनीतिक समझौता मानते हैं, जबकि रूस इसे यूक्रेन के रूस के साथ एकीकृत होने के रूप में देखता है। इस समय के बाद से, रूस ने यूक्रेन की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए कदम उठाए और उसे अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया।

रूसी साम्राज्य के तहत, यूक्रेनी भाषा, संस्कृति, और राजनीतिक पहचान पर प्रतिबंध लगाए गए। 19वीं शताब्दी में, रूसी अधिकारियों ने यूक्रेनी भाषा के इस्तेमाल पर सख्त नियंत्रण लागू किया, और यूक्रेन की सांस्कृतिक पहचान को दबाने की कोशिश की। यह यूक्रेन में राष्ट्रीयता और पहचान के संघर्ष का समय था। रूसी साम्राज्य ने यूक्रेन को अपने नियंत्रण में रखते हुए उसे कृषि उत्पादन का एक प्रमुख क्षेत्र बना दिया, लेकिन यूक्रेन की जनता ने स्वतंत्रता और स्वायत्तता के लिए संघर्ष जारी रखा।

सोवियत संघ और यूक्रेन

1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद, रूस में गृहयुद्ध छिड़ गया, और यूक्रेन ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की। हालांकि, 1922 में सोवियत संघ के गठन के साथ, यूक्रेन को एक समाजवादी गणराज्य के रूप में इसमें शामिल किया गया। सोवियत युग के दौरान, यूक्रेन ने भारी औद्योगिकीकरण देखा, लेकिन इसके साथ-साथ उसे कई भयावह अनुभवों से भी गुजरना पड़ा।

सबसे बड़ी त्रासदी 1932-1933 के “होलोडोमोर” (Holodomor) के रूप में आई, जब सोवियत नीतियों के कारण लाखों यूक्रेनियों की भुखमरी से मौत हो गई। होलोडोमोर को यूक्रेन में एक कृत्रिम अकाल के रूप में देखा जाता है, जिसे जोसेफ स्टालिन की सोवियत सरकार ने किसानों से जबरन अनाज लेकर उत्पन्न किया था। आज भी यूक्रेन इसे नरसंहार के रूप में मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष कर रहा है, जबकि रूस इसे एक राष्ट्रीय आपदा मानता है, लेकिन जानबूझकर किए गए नरसंहार के रूप में स्वीकार नहीं करता।

द्वितीय विश्व युद्ध और सोवियत नियंत्रण

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, यूक्रेन सोवियत संघ का एक प्रमुख युद्धक्षेत्र था, और नाज़ी जर्मनी ने इसे अपने कब्जे में लेने की कोशिश की। युद्ध के दौरान यूक्रेन में भारी विनाश हुआ और लाखों लोग मारे गए। युद्ध के बाद, सोवियत संघ ने यूक्रेन का पुनर्निर्माण किया, लेकिन इस प्रक्रिया में उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता पर और अधिक नियंत्रण रखा गया। सोवियत शासन के तहत, यूक्रेन में रूसी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा दिया गया, जबकि यूक्रेनी पहचान और भाषा को सीमित किया गया।

सोवियत संघ का पतन और यूक्रेन की स्वतंत्रता

1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद, यूक्रेन ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था, क्योंकि यूक्रेन के लोग अब स्वतंत्र रूप से अपना राजनीतिक भविष्य तय करने के लिए स्वतंत्र थे। हालांकि, रूस के साथ यूक्रेन के संबंध कभी भी सामान्य नहीं रहे। रूस ने यूक्रेन को हमेशा अपने प्रभाव क्षेत्र के हिस्से के रूप में देखा है, जबकि यूक्रेन ने पश्चिमी देशों, विशेष रूप से यूरोपीय संघ और नाटो के साथ मजबूत संबंध बनाने की कोशिश की है।

1991 के बाद, यूक्रेन में स्वतंत्रता की दिशा में कई प्रमुख कदम उठाए गए, लेकिन यह भी स्पष्ट हो गया कि यूक्रेन के लिए रूस के साथ अपने संबंधों को संतुलित करना आसान नहीं होगा। यूक्रेन में रूसी भाषी आबादी का एक बड़ा हिस्सा है, जो आज भी रूस के साथ घनिष्ठ संबंध चाहता है। दूसरी ओर, यूक्रेनी राष्ट्रवाद और पश्चिमी प्रभाव की बढ़ती मांग ने देश को दो दिशाओं में खींचा है।

रूस और यूक्रेन का इतिहास एक साझा अतीत से शुरू होता है, लेकिन समय के साथ दोनों देशों ने अलग-अलग रास्ते अपनाए। किवन रस से लेकर सोवियत संघ के युग तक, दोनों देशों के बीच की जड़ें गहरी हैं। हालांकि, 1991 के बाद से, यूक्रेन ने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश की है, जबकि रूस ने इसे अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखने की कोशिश की है। यह इतिहास और संस्कृति का संघर्ष आज के राजनीतिक और सैन्य संघर्षों की नींव रखता है, जो दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव का मुख्य कारण बना हुआ है।

आधुनिक समय में, यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच नहीं है, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है।

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